महिलाओं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बढ़ता जोर: छवि सुधारने की कोशिश या किसी बड़े मकसद की एडवांस मुहिम?

हालांकि, सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ RSS की छवि बदलने की कवायद है, या फिर इसके पीछे कोई दीर्घकालिक और बड़ा उद्देश्य छिपा है?

बीते कुछ वर्षों में RSS ने महिलाओं को संगठन में आगे लाने के कई प्रयास किए हैं:

संघ की शाखाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
राष्ट्रीय स्तर पर महिला नेतृत्व का उभरना
सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में महिलाओं की सक्रिय भूमिका
शिक्षा और नीति-निर्माण में महिला स्वयंसेवकों की संलग्नता

 संघ की महिला इकाई ‘राष्ट्र सेविका समिति’ भी पहले से ज्यादा सक्रिय हो रही है, और महिलाओं को संघ की विचारधारा के साथ जोड़ने का अभियान चलाया जा रहा है।

RSS पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि यह एक पुरुष-प्रधान और परंपरावादी संगठन है, जहां महिलाओं की भूमिका सीमित रही है।

राजनीतिक और सामाजिक आलोचना – संघ की आलोचना करने वाले लोग इसे पितृसत्तात्मक संगठन बताते रहे हैं।
युवाओं और शहरी वर्ग को जोड़ने की कोशिश – नई पीढ़ी को जोड़ने के लिए संघ को अपनी छवि बदलनी पड़ रही है।
वैश्विक स्तर पर नया संदेश – अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संघ की भूमिका को लेकर नई छवि गढ़ने की जरूरत महसूस हो रही है।

क्या महिलाओं को संगठन में लाना सिर्फ इन आलोचनाओं का जवाब देने की रणनीति है?

संघ की कार्यशैली हमेशा दीर्घकालिक रणनीति पर आधारित रही है। महिलाओं को संगठन में ज्यादा भागीदारी देने के पीछे कुछ बड़े उद्देश्य हो सकते हैं:

राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव बढ़ाना – संघ के करीब आने से महिलाओं का रुझान बीजेपी और अन्य संबद्ध संगठनों की ओर बढ़ सकता है।
संस्कृति और विचारधारा का प्रचार – अगर ज्यादा महिलाएं संघ से जुड़ती हैं, तो वे घर-परिवार में संघ की विचारधारा को बढ़ावा दे सकती हैं।
महिला नेतृत्व को तैयार करना – आने वाले दशकों में संघ महिलाओं को भी सशक्त नेतृत्वकर्ता के रूप में तैयार कर सकता है।

संघ का मकसद सिर्फ छवि सुधारना नहीं, बल्कि दूरगामी प्रभाव डालना भी हो सकता है।

RSS का यह अभियान भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका और उनकी विचारधारा पर प्रभाव डाल सकता है।

 अगर यह सिर्फ छवि सुधारने की कोशिश है, तो इसका असर अल्पकालिक होगा।
 लेकिन अगर यह संगठन के दीर्घकालिक एजेंडे का हिस्सा है, तो यह भारतीय राजनीति और समाज में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।

 अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या संघ सच में महिलाओं को समान अवसर देने की ओर बढ़ रहा है, या फिर यह सिर्फ एक रणनीतिक पहल है?

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