बुआ और बबुआ के अलग होने की यह है खास वजह , अखिलेश के लिए सबसे बड़ी हार

न्यूज़ डेस्क : अंतत: वही होते हुए दिख रहा है जिसकी चुनाव बाद आशंका जताई जा रही थी। सपा-बसपा का गठबंधन टूट की कगार पर पहुंच सा गया है। कहना गलत न होगा कि दोनों पार्टियों ने गठबंधन न केवल जल्दबाजी में किया बल्कि किसी गठबंधन को चलाने के लिए आधारभूत काम भी नहीं किया गया। सिर्फ और सिर्फ वोटों की गणित को आधार बनाया गया। जमीनी स्तर पर दोनों पार्टियों ने समर्थकों के बीच व्याप्त परस्पर विरोधी केमिस्ट्री को नहीं समझा और न समझने की कोशिश की।

 

समर्थक नहीं हुए थे एक: जब चुनाव नतीजे आए तो शायद ही कोई हो जिसे भाजपा के पक्ष में आए जनता के फैसले पर हैरत न हुई हो। तभी से गठबंधन की हार के कारणों पर चर्चा-मंथन शुरू हो गया था। सपा-बसपा ने केवल और केवल फूलपुर, गोरखपुर और कैराना उपचुनाव में मिली जीत के आधार पर अतिउत्साह में गठजोड़ तो कर लिया, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की मंशा-भावनाओं का कोई ख्याल नहीं रखा गया। नतीजा यह रहा कि ओबीसी की यादव बेल्ट में दलितों ने सपा को वोट नहीं किया। मैनपुरी, कन्नौज, इटावा और फर्रुखाबाद में सपा को मिले मतों का प्रतिशत इसका प्रमाण है। इन सीटों पर सपा का वोट प्रतिशत अच्छा खासा कम हो गया।

 

जमीनी हकीकत हुई नजरअंदाज: दरअसल, सपा-बसपा ने वर्ष 2014 में मिले मत प्रतिशत के आधार पर गठबंधन की नींव रखी थी। समझा गया कि सियासी गणित ठीक बैठ गया तो यादव, मुस्लिम और दलित वोट बैंक करीब पचास फीसदी पहुंच जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जमीनी स्तर पर दोनों जातियों में वह तालमेल नहीं बैठ सका, जो भाजपा ने अन्य सभी जातियों को साथ लेकर बिठाया। मसलन, भाजपा ने गैर यादव, गैर जाटव की सभी जातियों को पाले में लाने के लिए बाकायदा सम्मेलन किए। महीनों चली इस कवायद के जरिए भाजपा संदेश देने में कामयाब रही कि वह इन जातियों के लिए की सबसे बड़ी हितैषी है। 

 

यही नहीं ओम प्रकाश राजभर की तमाम आलोचनाओं के बावजूद उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई। ताकि कोई गलत संदेश न जाए। सपा-बसपा ने निचले स्तर पर अपने लोगों को एक करने के लिए दलितों और यादवों को सामाजिक रूप से एक साथ लाने का कोई विशेष प्रयास नहीं किया।

 

बसपा रही थी सफल : कहा जा रहा था कि यह गठबंधन बसपा की सोशल इंजीनियरिंग की तरह सफल हो जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कारण यह कि सपा-बसपा के वोटर यानी मुस्लिम, दलित व यादवों की संख्या तो अधिक हो रही थी लेकिन सामाजिक स्तर पर इन जातियों में मेल नहीं था। बसपा ने जब वर्ष 2007 में सोशल इंजीनियरिंग की तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और दलितों को साथ लिया। कहना गलत न होगा कि इन तीनों जातियों में ग्रामीण इलाकों में सामाजिक स्तर पर कोई बड़ा संघर्ष नहीं था, जबकि सपा-बसपा से जुड़ी जातियों के संघर्ष किसी से छिपे नहीं थे।

 

दूसरा प्रयोग भी असफल : कुछ ऐसी ही स्थिति सपा-कांग्रेस के साथ 2017 हुए गठबंधन में रही थी। उम्मीद थी कि यूपी में कांग्रेस और सपा का मत प्रतिशत मिलकर सत्ता हासिल कर लेंगी लेकिन नतीजे विपरीत रहे थे। राजनीतिक विश्लेषक पूर्व आईजी अरुण कुमार गुप्ता कहते हैं, ‘दरअसल, दो विरोधी दलों के साथ आने से पहले जरूरी है कि उनके समर्थकों-पदाधिकारियों की विचारधारा मेल खाए। सपा-बसपा और कांग्रेस-सपा के गठबंधन में यह तथ्य गायब था। जमीनी केमेस्ट्री नदारद थी। लिहाजा, नतीजे अप्रत्याशित रहे।’ 

 

विधानसभा चुनाव 2012 में वोट 

– बसपा 25.91% और 80 सीटें मिलीं.
– सपा 29.13 % और 224 सीटें जीतीं

वर्ष 2014 में वोट प्रतिशत.
– बसपा 19.77%, शून्य सीट
– सपा 22.35%, 05 सीटें

 

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