पूज्य सद्गुरुदेव आशिषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
ऐसे लोग स्वयं तो दु:खी रहते ही हैं, दूसरों को भी दु:खी करते हैं। हमारा चिंतन यदि सकारात्मक है तो हममें दया, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकार जैसे सदगुणों को देने वाली शक्ति का संचार होता है। यदि हमारा चिंतन नकारात्मक है तो हम राग-द्वेष के बंधन में बंधते चले जाते हैं। सकारात्मक चिंतन के कारण ही महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के सामने पांडवों को पांच गाँव देने का प्रस्ताव रखा था, पर नकारात्मक सोच वाले दुर्योधन ने श्रीकृष्ण का सकारात्मक चिंतन वाला प्रस्ताव ठुकरा कर युद्ध करने का निश्चय किया था, जिसका परिणाम भारी मात्र में जन-धन की हानि के रूप में सामने आया। इसलिए हम कह सकते हैं कि दु:ख और सुख का एकमात्र कारण हमारा चिंतन है कि हम कैसा चिंतन करते हैं। जो दु:खों में भी सुखों की तलाश करते हैं, वही सच्चे अर्थों में मानवता की सेवा कर पाते हैं और संसार को खुशियां बांटते हैं। अतः हमारा चिंतन सदैव सकारात्मक ही होना चाहिए …।
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